समास किसे कहते है? परिभाषा, उसके भेद उदाहरण सहित | समास विग्रह

समास किसे कहते है?, (What is Samas) परिभाषा, भेद एवं उदाहरण – समास और संधि के द्वारा शब्‍द रचना की जाती है। समास और संधि की शब्‍द रचना में अंतर होता है। संधि से केवल शब्‍द की रचना की जा सकती है। जबकि समास से  शब्‍द और पद दोनों रचनाएं की जाती है। इनमें समास के द्वारा बने पद को समास पद कहते है।

समास किसे कहते है
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समास किसे कहते है?

समास की परिभाषा दो या दो से अधिक शब्‍दों से मिलकर बना हुआ नया सार्थक शब्‍द समास कहलाता है।

समास का अर्थ“संक्षेप करना”। जब दो शब्‍द मिलाये जाते है तो उनके बीच दिये गये शब्‍द लुप्‍त हो जाते है। इन शब्‍दों में विशेषत: कारक होते है। इस प्रकार अनेक शब्‍दों के लिये एक समस्‍त पद बन जाता है।

समस्त पद किसे कहते हैं

समस्‍त पद/सामासिक पद की परिभाषा जिस प्रकार संधि में दो अक्षर पास-पास लाये जाते है उसी प्रकार समास में दो शब्द पास-पास लाये जाते है या मिलाये जाते है  इन शब्‍दों में मुख्‍य शब्‍द और गौण शब्‍द होते है। इन मुख्‍य शब्‍द ओर गौण शब्‍दों मे कारक, संयोजक शब्‍द, संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण भी होते है । इन सभी को समास के  नियम के द्वारा मिलाकर एक पद बनाया जाये तो उसे समस्‍त पद कहा जाता है। सीधे अर्थ में हम कह सकते है कि समास के  नियमों से बना पद सामासिक पद या समस्‍त पद कहलाता है|

समास विग्रह किसे कहते हैं उदाहरण सहित –

समास के नियम से बने सामसिक पद के अनेक पदों को अलग-अलग करने की प्रक्रिया समास विग्रह कहलाती है। समास  विग्रह को हम व्‍यास भी कहते है।  इसमे अनेक पद मिले होते है जिसका संबंध होता है कि कम से कम शब्‍दों में अधिक से अधिक अर्थ प्रकट हो. यही समास का प्रमुख लक्ष्‍य होता है। जैसे – नीलकमल ।  इसमें अनेक पद मिले हुये है। इन पदों को अलग अलग करने पर – नीला है जो कमल। 

पद – सामान्‍यत: शब्‍द को ही पद कहा जाता है। लेकिन जब दो या दो से अधिक शब्‍द मिलकर एक पद का निर्माण करते है तब जिस नियम से बने पद को उसका नाम दिया जाता है।

जैसे – संज्ञा पद, विशेषण पद,  क्रिया पद, समास पद

समास पद/सामासिक पद

समास पद मे कम से कम दो पद अवश्‍य होते है। एक शब्‍द को समास पद नहीं माना जाता है क्योंकि पदों के आधार पर ही समास में प्रधानता को बोध होता है । सामान्यतः समास में तीन पद होते लेकिन अधिकतर दों पदों का प्रचलन अधिक होता है। 

(1 ) पूर्वपद  
(2) उत्तरपद 

पूर्व पद किसे कहते हैं

पूर्व पद की परिभाषा पहला वाला पद पूर्व पद होता है। अर्थात जिस पद को मिलाते समय या पद संरचना करते समय पहले रख जाता है।
जैसे – प्रयोगशाला 
इस सामासिक पद में  “प्रयोग” पहला पद है। इसे प्रथम पद भी कहा जाता है।

उत्तर पद किसे कहते हैं

उत्तर पद की परिभाषा जब समास पद की रचना दो पदों से मिलकर की गयी है तो अंतिम पद को ही दूसरा पद या उत्तरपद कहा जाता है। जैसे – प्रयोगशाला  =  प्रयोग के लिये शाला 

इसमें अंतिम पद  शाला है। जबकि प्रथम पद प्रयोग है।

समास में पदों की प्रधानता

उत्तरपद प्रधान तत्‍पुरूष समास, कर्मधारय समास, द्विगु समास  
पूर्व पद प्रधानअव्‍ययी भाव समास
दोनों पद प्रधानद्वंद्व समास 
दोनों पद अप्रधानबहुब्रीही समास
तृतीय पद की प्रधानताजब उत्‍तर पद और पूर्व पद दोनों में से कोई भी पद प्रधान न हो
पदों की प्रधानता के आधार पर समास

पदों की प्रधानता का अर्थ होता है कि जब समासिक पद में अन्‍य पद समान रूप से बराबर न होकर एक दूसरे पद पर निर्भर या आश्रित होतें है। जो पद दूसरे पद पर आश्रित होते है। उस पद को हम गौण पद कहते है। गौण पद हमेशा मुख्‍य पद पर आश्रित होता है। पदों की  प्रधानता के आधार पर ही पदों में भेद किया जाता है

उत्तरपद प्रधान – जिन समास मे उत्तरपद प्रधान होता है| जैसे – तत्‍पुरूष समास, कर्मधारय समास, द्विगु समास

पूर्व पद प्रधान – जिसका पहला पद प्रधान हो। जैसे – अव्‍ययी भाव समास  

दोनों पद प्रधान –  जिस सामासिक पद में दोनों पद प्रधान हो। – जैसे  – द्वंद्व समास 

दोनों पद अप्रधान – जिस समासिक पद मे दोनो पद अप्रधान हो । – जैसे  – बहुब्रीही समास

तृतीय पद की प्रधानता – जब उत्तरपद और पूर्व पद दोनों में से कोई भी पद प्रधान न हो या दोनों पद बराबर प्रधानता वाले हो तो उसमें तृतीय पद प्रधान होता है। सामान्‍यत: कहा जा सकता है यह पद अदृश्‍य होता है इस कारण इसमें तीसरा अर्थ प्रधान माना जाता है।  

जैसे – विषधर। विष को धारण करने वाला। इस वाक्‍य में विष और धारण दोनों ही गौण पद है यह पद कोई तीसरा अर्थ निकल रहा है इसलिये तीसरा अर्थ पद प्रधान होगा अर्थात दोनों पद अप्रधान माने जायेगें। 

विभक्तियाँ कितनी होती हैं?

सामासिक पद को अलग करने वाले शब्‍द विभक्तियां कहलाते है। इनमे कारक शामिल होते है। कारक विभक्तियां सामान्यतः आठ प्रकार की होती है लेकिन समास में  केवल छ: विभक्तियों का प्रयोग समास विग्रह में किया जाता है। जिसमें संबोधन और कर्ता कारक विभक्ति का प्रयोग नहीं होता है। 

समास में प्रयोग की जाने वाली छ: विभक्तियों के नाम :– 

  • कर्म कारक – द्वितीया विभक्ति कहते है । 
  • करण कारक – इसे तृतीय विभक्ति कहते है 
  • संप्रदान विभक्ति – इसे चतुर्थी  विभक्ति कहा जाता है । 
  • अपादान विभक्ति – इसे  पंचमी  विभक्ति कहा  जाता है । 
  • संबंध विभक्तियां – इसे  षष्‍ठी विभक्ति कहा जाता है । 
  • अधिकरण विभक्ति –  इसे सप्‍तमी विभक्ति कहा जाता है| 

इन्ही विभक्तियों के आधार पर तत्‍पुरूष समास को छ: भेदों में बांटा गया है|

कर्म कारकद्वितीया विभक्ति
करण कारकतृतीय विभक्ति
संप्रदान विभक्तिचतुर्थी  विभक्ति
अपादान विभक्तिपंचमी  विभक्ति
संबंध विभक्तियांषष्‍ठी विभक्ति
अधिकरण विभक्तिसप्‍तमी विभक्ति
विभक्तियाँ

समास के प्रकार –

  1. अव्‍ययी भाव समास
  2. तत्‍पुरूष समास
  3. कर्मधारय  समास 
  4. द्विगु समास 
  5. द्वंद्व समास
  6. बहुव्रीहि समास 

अतः समास 6 प्रकार के होते है।

1. अव्ययीभाव समास किसे कहते हैं

परिभाषा – जिस समास में पहला पद प्रधान होता है उसे अव्‍ययी भाव समास कहा जाता है। यह वाक्‍य में  क्रिया विशेषण का कार्य करता है  या जिस समास में पूर्व पद अव्यय हो अर्थात खर्च न हो उस सामासिक पद में अव्‍ययी भाव समास होता है। 

अव्ययीभाव समास के 10 उदाहरण –

समस्त-पदसमास विग्रह
यथासमय  समय के अनुसार
आजीवन जीवन भर 
प्रति-दिन प्रत्‍येक दिन 
अनुरूप रूप के अनुसार
भर पेटपेट भर कर 
यथेष्‍ट  यथा ईष्‍ट 
उपकृष्‍ण कृष्‍ण के समीप 
आसेतुसेतु  तक
प्रतिदिन दिन दिन 
अव्ययीभाव समास के उदाहरण

2. तत्‍पुरूष समास किसे कहते हैं?

परिभाषा – जिस समासिक पद में पूर्व पद गौण और उत्‍तर पद प्रधान हो, उसे तत्‍पुरूष समास कहा जाता है। इसमें विभक्तियों का प्रयोग किया जाता है। दोनों पदों के बीच कारक चिन्‍ह लोप हो जाता है।

विभक्तियों के आधार पर तत्पुरुष समास के 6 भेद होते है। तत्पुरुष समास के 6 प्रकार – कर्म, करण, संप्रदान, अपादान, संबंध, और अधिकरण तत्‍पुरुष समास है.

तत्पुरुष समास के प्रकार

  1. कर्म तत्‍पुरुष समास
  2. करण तत्पुरुष समास
  3. संप्रदान तत्‍पुरुष समास
  4. अपादान तत्पुरुष समास
  5. संबंध तत्‍पुरुष समास
  6. अधिकरण तत्‍पुरुष समास

(।) कर्म तत्‍पुरुष समास किसे कहते है?

कर्म तत्पुरुष (द्वितीया तत्पुरुष):- इसे द्वितीया तत्‍पुरुष भी कहा जाता है। इसमें ‘को’ विभक्ति का लोप होता है। 

कर्म तत्‍पुरुष समास के उदाहरण

समस्त-पदसमास विग्रह
गगनचुम्बीगगन को चूमने वाला 
मतदातामत को देने वाला
गिरहकटगिरह को काटने वाला 
नगरगमननगर को गमन करने वाला 
ज्ञान प्राप्‍तज्ञान को प्राप्‍त करने वाला 
चिड़ीमारचिड़ियों को मारने वाला
जेबकतराजेब को कतरने वाला
गुरु नमनगुरु को नमन करने  वाला 
परलाके गमनपरलाके को गमन
मनोहरमन को हरने वाला
यशप्राप्तयश को प्राप्त 
कर्म तत्‍पुरुष समास के उदाहरण

(II) करण तत्पुरुष समास किसे कहते है?

करण-तत्पुरुष (तृतीय तत्पुरुष): – इसमें करण कारक विभक्ति का लोप होता है। इसे तृतीया तत्‍पुरुष कहा जाता है। लोप होने वाली विभक्ति  ‘से’  और ‘के द्वारा’  है।

करण तत्पुरुष समास के उदाहरण
समस्त-पदसमास विग्रह
भयातुर भय से आतुर
श्रद्धापूर्णश्रद्धा से पूर्ण  
ईश्‍वर प्रद्दतईश्‍वर के द्वारा प्रद्दत
ईश्वरदत्त ईश्वर के द्वारा दिया हुआ
कष्टसाध्य कष्ट से साध्य (कष्ट से साधा)
मुँह मांगामुँह से मांगा हुआ 
शोक ग्रस्‍त शोक से ग्रस्‍त
रोगमुक्तरोग से मुक्त             
करुणापूर्णकरुणा से पूर्ण 
रेखांकितरेखा से अंकित
 सूररचितसूर द्वारा रचित
तारों भरीतारों से भरी हुई      
करण तत्पुरुष समास के उदाहरण

(III) संप्रदान तत्‍पुरुष समास किसे कहते है?

संप्रदान तत्पुरुष (चतुर्थी तत्पुरुष) – इसमे संप्रदान कारक विभक्ति का लोप होता है। इसे चतुर्थी तत्‍पुरुष कहते है। इसमें कारक विभक्ति ‘के लिये’ का लोप होता है। 

संप्रदान तत्‍पुरुष समास के उदाहरण
समस्त-पदसमास विग्रह
राष्‍ट्र प्रेमराष्‍ट्र के लिये प्रेम 
पूजा घरपूजा के लिये घर
डाकगाड़ी डाक के लिए गाड़ी
विद्यालयविद्या के लिये आलय 
घुड़साल घोड़े के लिए साल
भूतबलिभूत के लिये बलि 
गौशाला गाय के लिए शाला
सिनेमा घरसिनेमा के लिये घर 
सभाभवनसभा के लिए भवन 
प्रयोगशालाप्रयोग के लिए शाला
स्नानघरस्नान के लिए घर
यज्ञशालायज्ञ के लिए शाला
परीक्षा भवनपरीक्षा के लिए भवन 
संप्रदान तत्‍पुरुष समास के उदाहरण

(IV) अपादान तत्पुरुष समास किसे कहते है?

परिभाषा – अपादान तत्पुरुष (पंचमी तत्पुरुष) – इसे पंचमी तत्‍पुरष कहा जाता है। इसमे अपादान विभक्ति ‘से का लोप हो जाता है। 

अपादान तत्पुरुष समास के उदाहरण
समस्त-पदसमास विग्रह
धनहीनधन से हीन
दोषमुक्त दोष से मुक्त
चरित्रहीन  चरित्र से हीन
गुणरहित गुण से रहित
लक्ष्‍यहीन लक्ष्‍य से हीन 
जन्मांध जन्म से अंधा
मायारिक्तमाया से रिक्त
शक्तिहीनशक्ति से हीन
पथभ्रष्टपथ से भ्रष्ट
पदच्युतपद से च्युत
पापमुक्तपाप से मुक्त  
अपादान तत्पुरुष समास के उदाहऱण

(V) संबंध तत्‍पुरुष समास किसे कहते है?

संबंध तत्पुरुष (षष्ठी तत्पुरुष) – इसमें संबंध कारक विभक्ति  ‘का’, ‘की’, ‘के’  आदि का लोप होता है । 

संबंध तत्‍पुरुष समास के उदाहरण
समस्त-पदसमास विग्रह
देव कृपादेव की कृपा  
जलधारा जल की धारा
विषयसूची विषय की सूची
राजपुरुषराजा का पुरुष
मंत्रिपरिषद मंत्रियों की परिषद
वायुयानवायु का यान
चर्मरोग चर्म का रोग
हिमालयहिम का आलय  
राष्ट्रपतिराष्ट्र का पति
अमरसआम का रस    
राजपुत्रराजा का पुत्र  
राजाज्ञाराजा की आज्ञा 
शिवालयशिव का आलय 
विद्यासागरविद्या का सागर 
संबंध तत्‍पुरुष समास के उदाहरण

 

(VI) अधिकरण तत्‍पुरुष समास किसे कहते है?

अधिकरण तत्पुरुषः (सप्तमी तत्पुरुष) – इसमें अधिकरण कारक विभक्ति  ‘में और ‘पर’ का लोप होता है। 

अधिकरण तत्‍पुरुष समास के उदाहरण
समस्त-पदसमास विग्रह
आप बीती आप पर बीती
नगरवासनगर में वास
वनवास वन में वास
दानवीर दान में वीर  
साइकिल सवार साइकिल पर सवार
फलासक्त फल में आसक्त
सिरदर्दसिर में दर्द 
ग्राम वासग्राम में वास 
शोकमग्नशोक में मग्न 
लोकप्रियलोक में प्रिय
कलाश्रेष्ठकला में श्रेष्ठ 
पुरुषोत्तम पुरुषों में उत्तम
अधिकरण तत्‍पुरुष समास के उदाहरण

यह भी जरूर पढ़ें: समास | रस | पल्लवन | संक्षेपण और सम्पूर्ण हिंदी व्याकरण

3. कर्मधारय समास किसे कहते है?

कर्मधारय समास में भी उत्तर पद प्रधान होता है, इसमें प्रथम पद विशेषण तथा द्वितीय पद विशेष्य होता है| इस समास में उपमेय और उपमान का संबंध पाया जाता है। या जिस समस्त पद का उत्तरपद प्रधान हो तथा पूर्वपद व उत्तरपद में उपमान-उपमेय अथवा विशेषण-विशेष्य संबंध हो, कर्मधारय समास कहलाता हैं|

पहचान – विग्रह करने पर दोनों पद के मध्य में ‘है जो’ ‘के समान’ आदि आते है।

कर्मधारय समास के उदाहरण
समस्त-पदसमास विग्रह
नीलकमल नीला है जो कमल 
महाकाव्‍यमहान है जो काव्‍य 
सद्गुण सद है जो गुण
महाराजामहान है जो राजा 
भलामानसभला है जो मानस 
परमानंदपरम है जो आंनद
महादेवमहान है जो देव      
चरणकमलकमल के समान चरण
लाल टोपीलाल है जो टोपी     
नवयुवकनव है जो युवक
लालमणिलाल है जो मणि
कनकलताकनक के समान 
कमलनयनकमल के समान नयन
कर्मधारय समास के उदाहरण

4. द्विगु समास किसे कहते है?

परिभाषा – जिस समास का पहला पद संख्‍यावाचक हो तथा पूरा पद समूह का बोध कराये, अर्थात जिस समास का समस्त पद का पूर्वपद संख्यावाचक विशेषण हो, वह द्विगु समास कहलाता है। इसमें समूह या समाहार का ज्ञान होता है|

जैसे – तीनों कोणों का समाहार अर्थात त्रिकोण

समस्त-पदसमास विग्रह
चौमासाचार मांसों का समाहार
नवरत्न नौ रत्नों का समूह
सतसईसात सौ का समूह 
त्रिभुवन तीनों भुवनों का समूह
पंचतत्‍वपांच तत्‍वों का समूह  
चौराहा चार राहों का समूह 
शताब्दी सौ वर्षों का समूह
त्रिफलातीन फलों का समाहार
दुधारीदो धारों वाली (तलवार)
सप्ताहसात दिनों का समूह
तिरंगातीन रंगों का समूह
पंचपत्रपाँच पात्रों का समाहार
सप्तसिंधुसात सिंधुओं का समूह
द्विगु समास के उदाहरण

5. द्वन्‍द्व समास किसे कहते है?

परिभाषा – द्वन्द्व समास में दोनों पूर्व पद तथा उत्तरपद प्रधान होते है या जोडे के साथ होते है तथा अर्थ की दृष्टि से दोनों पद स्वतंत्र होते है एवं उनके मध्य के संयोजक शब्द (-) हो लोप हो जाता है या जिस समस्त-पद के दोनों पद प्रधान हों तथा विग्रह करने पर ‘और‘ ‘अथवा‘, ‘या‘, एवं ‘एवं‘ लगता हों, वह द्वंद्व समास कहलाता है|
पहचान – दोनों पद को बीच प्रायः योजक चिन्ह (-) का प्रयोग
जैसे –  नमकमिर्च = नमक और मिर्ची

द्वन्‍द्व समास के उदाहरण
समस्त-पदसमास विग्रह
माता – पितामाता और पिता 
पाप-पुण्य पाप और पुण्य
राजा – रानी राजा और रानी 
भला – बुराभला और बुरा 
फल-फूल फल और फूल
लाभ हानि  लाभ और हानि
आगा-पीछा आगा और पीछा
दाल – रोटीदाल और रोटी 
नदी – नालेनदी और नाले 
गुण-दोषगुण और दोष
ठंडा-गरमठंडा या गरम 
अपना-परायाअपना और पराया 
द्वन्‍द्व समास के उदाहरण

6. बहुब्रीहि समास किसे कहते है?

परिभाषा – जिस समास में दोनों पदों के माध्यम से एक तीसरे अर्थ (विशेष) का बोध होता है अर्थात इसमें दोनों पद अप्रधान होते है तथा तीसरा अर्थ पद प्रधान होता है या तीसरे पद की ओर संकेत करता है अथवा जिस समस्त-पद में कोई पद प्रधान नहीं होता, दोनों पद मिल कर किसी तीसरे पद की ओर संकेत करते हैं, उसे बहुब्रीहि समास कहते है|

जैसे – ‘नीलकंठ‘ नीला है कंठ जिसका अर्थात् शिव। यहाँ पर दोनों पदों ने मिल कर एक तीसरे पद ‘शिव‘ का संकेत किया | इसलिए यह बहुव्रीहि समास हैं;

बहुब्रीहि समास के उदाहरण
समस्त-पदसमास विग्रह
महादेव महान है जो देव  अर्थात शिव
चंद्रमौलिचंद्र है मोलि पर जिसके अर्थात  शिव 
दशाननदश है आनन जिसके अर्थात रावण  
लम्बोदर लम्बा है जिनका उदर अर्थात गणेशजी
घन श्‍यामघन के समान श्‍याम है अर्थात कृष्‍ण 
गिरिधर गिरि को धारण करने वाले अर्थात कृष्ण
विष धरविष को धारण करने वाला अर्थात  सर्प 
मृत्‍युंजयमृत्‍यू को जीतने वाला अर्थात  शंकर 
नीलकंठ नीला है कंठ जिनका अर्थात शिवजी
पशुपतिवह जो पशुओं का पति है अर्थात् शिव
ब्रजेशवह जो ब्रज के ईश है अर्थात् श्रीकृष्ण
चक्रपाणि चक्र है पाणि में जिसके (विष्णु)
महावीर  महान वीर है जो (हनुमान)
प्रधानमंत्रीमंत्रियों में प्रधान है जो (प्रधानमंत्री)
त्रिलोचनतीन हैं लोचन जिसके (शिव)

 

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दो समासों के बीच अंतर

द्विगु और बहुव्रीहि समास में अंतर

द्विगु समास का पहला पद संख्यावाचक विशेषण होता है और दूसरा पद विशेष्य होता है, जबकि बहुव्रीहि समास में समस्त पद ही विशेषण का कार्य करता है|
जैसे – चतुर्भुज – चार भुजाओं का समूह – द्विगु समास।
चतुर्भुज – चार हैं भुजाएँ जिसकी अर्थात् विष्णु – बहुव्रीहि समास।
पंचवटी – पाँच वटों का समाहार – द्विगु समास।
पंचवटी – पाँच वटों से घिरा एक निश्चित स्थल अर्थात् दंडकारण्य में स्थित वह स्थान जहाँ वनवासी राम ने सीता और लक्ष्मण के साथ निवास किया – बहुव्रीहि समास।
दशानन – दस आननों का समूह – द्विगु समास।
दशानन – दस आनन हैं जिसके अर्थात् रावण बहुव्रीहि समास।

कर्मधारय और बहुब्रीहि समास में अंतर

कर्मधारय और बहुब्रीहि समास में अंतर में समझने से पहले इन दोनों के उदाहरण का समास विग्रह समझते है| कर्मधारय समास का एक पद विशेषण (उपमान) तथा दूसरा पद विशेष्य (उपमेय) होता है या कर्मधारय समास में एक पद विशेषण या उपमान होता है और दूसरा पद विशेष्य या उपमेय है;
जैसे – नीलकंठ – नीला है जो कंठ – कर्मधारय समास।
नीलकंठ – नीला है कंठ जिसका अर्थात् शिव- बहुव्रीहि समास।
लंबोदर – मोटे पेट वाला – कर्मधारय समास।
लंबोदर – लम्बा है उदर जिसका अर्थात् गणेश – बहुव्रीहि समास।

द्विगु और कर्मधारय में अंतर

  1. द्विगु का पहला पद हमेशा संख्यावाचक विशेषण होता है जो दूसरे पद की गिनती बताता है जबकि कर्मधारय का एक पद विशेषण होने पर भी संख्यावाचक कभी नहीं होता है।
  2. द्विगु का पहला पद ही विशेषण बन कर प्रयोग में आता है जबकि कर्मधारय में कोई भी पद दूसरे पद का विशेषण हो सकता है;

संधि और समास में अंतर

अर्थ की दृष्टि से यद्यपि दोनों शब्द समान हैं अर्थात् दोनों का अर्थ ‘मेल‘ ही है तथापि दोनों में कुछ भिन्नताएँ हैं जो निम्नलिखित हैं।

  1. संधि वर्णों का मेल है और समास शब्दों का मेल है।
  2. संधि में वर्णों के योग से वर्ण परिवर्तन भी होता है जबकि समास में ऐसा नहीं होता।
  3. समास में बहुत से पदों के बीच के कारक-चिन्हों का अथवा समुच्चयबोध का लोप हो जाता है;
    • जैसे – विद्या $ आलय त्र विद्यालय – संधि
    • राजा का पुत्र त्र राजपुत्र – समास
  4. संधि के तोड़ने को संधि-विच्छेद कहते हैं, जबकि समास के पदों को अलग करने को ‘समास विग्रह‘ कहते है।

निष्कर्ष – इस प्रकार आपने इस लेख के माध्यम से जाना कि समास किसे कहते है, समास की परिभाषा, समास के भेद और समास विग्रह उदाहरण सहित. हमने आपको इस लेख के माध्यम से समास की सम्पूर्ण जानकारी देने की कोशिश की है. हमने आपको दो समासों के बीच में क्या अंतर होता है ये भी समझाया है. अगर इसके बाद भी आपके मन में समास या अन्य किसी विषय पर कोई सवाल या सुझाव हो तो हमें Comment Box में जरुर बताएं. धन्यवाद|

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